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Bihar Vigilance: मद्य निषेध विभाग के दागी अफसरों की फाइल खुली, समस्तीपुर कनेक्शन भी चर्चा में

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Alam Ki Khabar: बिहार निगरानी ब्यूरो की सार्वजनिक सूची में मद्य निषेध एवं उत्पाद विभाग के कई अधिकारियों के खिलाफ दर्ज ट्रैप और आय से अधिक संपत्ति के मामलों का विवरण सामने आया है। समस्तीपुर के तत्कालीन उत्पाद निरीक्षक का नाम भी सूची में शामिल है।

पटना, 29 जुलाई। आलम की खबर: बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को लेकर निगरानी ब्यूरो की सार्वजनिक सूची ने मद्य निषेध एवं उत्पाद विभाग की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सूची के अनुसार वर्ष 2007 से 2016 के बीच विभाग के कई अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ रिश्वतखोरी (ट्रैप) तथा आय से अधिक संपत्ति (DA) के मामले दर्ज हुए। इन मामलों में कई अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है, जबकि कुछ मामलों में करोड़ों रुपये की संपत्ति जब्त करने के प्रस्ताव अब भी अदालत में लंबित हैं। सूची में समस्तीपुर के तत्कालीन उत्पाद निरीक्षक का नाम भी शामिल है, जिससे यह मामला जिले में भी चर्चा का विषय बन गया है।

निगरानी ब्यूरो के रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2007 में उत्पाद विभाग के चार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई दर्ज की गई थी। इनमें एक अधिकारी पर आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज हुआ, जबकि तीन अधिकारियों को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किया गया था। समस्तीपुर के तत्कालीन उत्पाद निरीक्षक सुरेन्द्र प्रसाद भी इन्हीं मामलों में शामिल थे। उनके खिलाफ वर्ष 2007 में ट्रैप केस दर्ज किया गया और बाद में अदालत में चार्जशीट भी दाखिल की गई। उपलब्ध रिकॉर्ड में इस मामले के अंतिम न्यायिक परिणाम का उल्लेख नहीं है।

रिकॉर्ड में तत्कालीन उत्पाद अधीक्षक संजय कुमार का मामला भी प्रमुखता से दर्ज है। उनके खिलाफ ट्रैप और आय से अधिक संपत्ति के दो अलग-अलग मामले दर्ज किए गए थे। निगरानी ब्यूरो ने लगभग ₹97.75 लाख की संपत्ति जब्त करने का प्रस्ताव भी अदालत में दायर किया था, जिस पर न्यायिक प्रक्रिया जारी है।

इसी तरह औरंगाबाद के तत्कालीन प्रभारी उत्पाद अधीक्षक सरोज कुमार के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज हुआ। उनके विरुद्ध करीब ₹1.62 करोड़ की संपत्ति जब्ती का प्रस्ताव भी विशेष न्यायालय में विचाराधीन बताया गया है।

सूची में सिवान, मधेपुरा, नालंदा, सहरसा, गया और खगड़िया सहित कई जिलों के अधिकारियों और कर्मचारियों के नाम दर्ज हैं। कुछ मामलों में अदालत में चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, जबकि कुछ मामलों में फैसला भी आ चुका है। वहीं कई मामलों की सुनवाई अभी भी लंबित है।

निगरानी ब्यूरो की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी मुख्य रूप से वर्ष 2007 से 2016 के बीच दर्ज मामलों से संबंधित है। इसके बाद के वर्षों में उत्पाद विभाग से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों की जांच अन्य एजेंसियों द्वारा भी की गई है। विभागीय रिकॉर्ड यह भी बताता है कि कई मामलों में कानूनी प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है।

भ्रष्टाचार विरोधी मामलों के जानकारों का कहना है कि किसी अधिकारी के खिलाफ प्राथमिकी या चार्जशीट दाखिल होना अंतिम दोष सिद्ध होना नहीं माना जाता। अंतिम निर्णय न्यायालय के आदेश के बाद ही माना जाता है। ऐसे में जिन मामलों की सुनवाई लंबित है, उनमें संबंधित अधिकारियों की कानूनी स्थिति का अंतिम फैसला अदालत ही करेगी।

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विशेष टिप्पणी

निगरानी ब्यूरो की सूची ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि भ्रष्टाचार के मामलों में केवल प्राथमिकी दर्ज करना पर्याप्त नहीं है। लंबित मामलों का समयबद्ध निपटारा और विभागीय स्तर पर त्वरित निर्णय भी उतने ही जरूरी हैं। इससे प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जनता का विश्वास दोनों मजबूत होंगे।

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